कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से बने रिश्तों का अंत अगर शादी में न हो, तो उसे 'रेप' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता।
दरअसल, एक महिला ने अपने पूर्व साथी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (रेप) के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। दोनों की मुलाकात आयरलैंड में हुई थी और वे लगभग दो साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे थे। महिला पहले से तलाकशुदा थी और उसका एक बच्चा भी था। जब आरोपी भारत लौटा और उसने महिला से संपर्क तोड़ दिया, तब महिला ने धोखाधड़ी और रेप का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी मर्जी से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो बाद में शादी से इंकार करना उस रिश्ते को 'रेप' में नहीं बदल देता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का झूठा वादा केवल तब माना जाता है, जब पुरुष की नीयत शुरू से ही धोखा देने की हो। अगर रिश्ते के दौरान भावनात्मक तालमेल की कमी या पारिवारिक विरोध के कारण शादी नहीं हो पाती, तो इसे आपराधिक मंशा नहीं कहा जा सकता।
न्यायमूर्ति ने कहा, "आपराधिक न्याय प्रणाली राज्य की शक्ति का साधन है। इसे विफल रिश्तों के निजी विवादों में हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।" कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पूरी कहानी आयरलैंड की है, जहां वे साथ रहे और साथ जीवन बिताया। यह मामला हिंसा का नहीं बल्कि विश्वासघात का है, और विश्वासघात कानूनी रूप से बलात्कार नहीं है।
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